पी. वी. नरसिम्ह राव

Biography of P. V. Narsimha Rao in Hindi
पी. वी. नरसिम्हा राव
स्रोत:www.newindianexpress.com

जन्म: 28 जून, 1921, वन्गारा, आंध्र प्रदेश

मृत्यु: 23 दिसम्बर, 2004

कार्य: राजनेता, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री

पामुलापति वेंकट नरसिंह राव (पी. वी. नरसिम्हा राव) एक भारतीय राजनेता थे। वे भारत के नौवें प्रधानमंत्री थे। उनका प्रधानमंत्री बनना इस बात के लिए भी महत्वपूर्ण है की वे पहले दक्षिण भारतीय थे जो भारत के प्रधानमंत्री बने। नरसिंह राव को भारत में कई प्रमुख आर्थिक परिवर्तन लाने का श्रेय भी दिया जाता है| उनके नेतृत्व में ही भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘लाइसेंस राज’ की समाप्ति हुई और अर्थनीति में खुलेपन का आरम्भ हुआ। उन्होंने तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मिलकर देश की जर्जर अर्थव्यवस्था को वैश्विकरण और उदारीकरण के माध्यम से एक नयी दिशा प्रदान की। इसी कारण उन्हें “भारत के आर्थिक सुधार का पिता” माना जाता है। भारतीय राजनीति के इतिहास में उनका कार्यकाल घटनापूर्ण रहा। उन्होंने एक ऐसी अर्थव्यवस्था की शुरुआत की जो नेहरु के मिश्रित अर्थव्यवस्था के सिद्धांत से बिलकुल भिन्न था। उनके द्वारा प्रारंभ की गयी आर्थिक सुधार की नीति को बाद में आने वाली वाजपेयी और मनमोहन सिंह सरकारों ने भी जारी रखा। उनकी सरकार अल्पमत में थी फिर भी उन्होंने 5 साल पूरा करने में सफलता हासिल की। उनकी इस योग्यता के कारण उन्हें ‘चाणक्य’ भी कहा गया।

Story of Bhagat Singh

राजनेता के साथ-साथ राव कई भाषाओँ के विद्वान् भी थे। उन्हें 17 भाषाओँ का ज्ञान था और संस्कृत के वे बड़े विद्वान थे। साहित्य के अलावा उन्हें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग जैसे विषयों में भी रूचि थी। उनके कार्यकाल के दौरान भी देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (बी.जे.पी.) का उत्कर्ष हुआ और अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद भी ढहा दी गयी।

प्रारंभिक जीवन

पी वी नरसिंहराव का जन्म 28 जून, 1921 को करीमनगर, आंध्र प्रदेश, में एक सामान्य परिवार में हुआ था। उनके पिता पी. रंगा राव और माता रुक्मिनिअम्मा कृषक थे। राव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा करीमनगर जिले के भीमदेवरापल्ली मंडल के कत्कुरू गाँव में अपने एक रिश्तेदार के घर रहकर ग्रहण की। इसके पश्चात उन्होंने ओस्मानिया विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद नागपुर विश्वविद्यालय के अंतर्गत हिस्लोप कॉलेज से लॉ की पढाई की। राव की मातृभाषा तेलुगु थी पर मराठी भाषा पर भी उनकी जोरदार पकड़ थी। आठ भारतीय भाषाओँ (तेलुगु, तमिल, मराठी, हिंदी, संस्कृत, उड़िया, बंगाली और गुजराती) के अलावा वे अंग्रेजी, फ्रांसीसी, अरबी, स्पेनिश, जर्मन और पर्शियन बोलने में पारंगत थे।

राजनैतिक जीवन

नरसिंह राव भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान एक सक्रीय कार्यकर्ता थे और आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। राजनीति में आने के बाद राव ने पहले आन्ध्र प्रदेश और फिर बाद में केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला। आंध्र प्रदेश सरकार में सन 1962 से 64 तक वे कानून एवं सूचना मंत्री, सन 1964 से 67 तक कानून एवं विधि मंत्री, सन 1967 में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री और सन 1968 से 1971 तक शिक्षा मंत्री रहे। नरसिंह राव सन 1971 से 1973 तक आंध्र प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे। वे सन 1957 से लेकर सन 1977 तक आंध्र प्रदेश विधान सभा और सन 1977 से 1984 तक लोकसभा के सदस्य रहे और दिसंबर 1984 में रामटेक सीट से आठवीं लोकसभा के लिए चुने गए।

राज्य स्तर पर विभिन्न विभागों और मंत्रालयों में अनुभव प्राप्त राव ने केंद्र सरकार में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। राजनीति में उनके विविध अनुभव के कारण ही उन्हें केंद्र सरकार में गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालय जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गयी। नरसिंह राव 14 जनवरी 1980 से 18 जुलाई 1984 तक विदेश मंत्री, 19 जुलाई 1984 से 31 दिसंबर 1984 तक गृह मंत्री एवं 31 दिसंबर 1984 से 25 सितम्बर 1985 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में भी केंद्र सरकार में कार्य किया।

ऐसा माना जाता है की सन 1982 में ज्ञानी जैल सिंह के साथ-साथ राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम पर भी विचार किया गया था।

सन 1991 के आस-पास राव ने सक्रीय राजनीति से लगभग संन्यास सा ले लिया था पर राजीव गाँधी की हत्या के बाद उनकी किस्मत पलती और वे एकाएक भारतीय राजनीति के केंद्रबिंदु बन गए। सन 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सबसे अधिक सीटों पर विजय हासिल की पर उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था। इसके बाद नरसिंह राव को अल्पमत सरकार चलने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। इस प्रकार राव नेहरु-गाँधी परिवार के बाहर पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पूरे पांच साल प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। वे पहले दक्षिण-भारतीय प्रधानमंत्री भी थे। उन्होंने परंपरा से हटते हुए एक गैर-राजनैतिक मनमोहन सिंह को देश का वित्त मंत्री बनाया। उन्होंने विपक्षी दल के सुब्रमण्यम स्वामी को ‘श्रमिक मापदंड और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार’ आयोग का अध्यक्ष बनाया – यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहला अवसर था जब विपक्ष के किसी सदस्य को कैबिनेट स्तर का पद दिया गया हो।

आर्थिक सुधार

जब सन 1991 में नरसिंह राव भारत के प्रधान मंत्री बने उस समय देश की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा ख़राब थी। उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती थी पर उन्होंने इस गंभीर परिस्थिति का हल अपनी सूझ-बूझ के साथ निकला। उन्होंने अर्थशाष्त्री मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी और देश को एक नए आर्थिक दौर में ले गए। उन्होंने विदेशी निवेश, पूंजी बाज़ार, मौजूदा व्यापार व्यवस्था और घरेलु व्यापार के क्षेत्र में सुधार लागू किये। उनकी सरकार का लक्ष्य था मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण, सार्वजानिक क्षेत्र का निजीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना। उन्होंने औद्योगिक लाइसेंसिंग प्रणाली में भी सुधार करते हुए मात्र 18 महत्वपूर्ण उद्योगों को इसके अन्दर रखा। उनके आर्थिक सुधारों का ही नतीजा था कि देश में विदेशी निवेश बहुत तेज़ी से बढ़ा।

राष्ट्रिय सुरक्षा और विदेश नीति

राव के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रिय सुरक्षा और विदेशी नीति के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बातें हुईं। इस दौरान मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को गति मिली जिसके परिणामस्वरूप सन 1998 में वाजपेयी सरकार परमाणु परिक्षण करने में सफल रही। उन्होंने पाकिस्तान और चीन को ध्यान में रखते हुए देश की सैन्य ताकत में वृद्धि की और पंजाब में आतंकवाद का सफाया भी उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। उन्होंने आतंकवाद और आतंकवादियों द्वारा अपहरण की घटनाओं का सामना प्रभावशाली तरीके से किया।

विदेश नीति के क्षेत्र में उन्होंने पश्चिमी यूरोप, चीन और अमेरिका से सम्बन्ध सुधरने की दिशा में प्रयास किया और भारत-इजराइल सम्बन्ध को एक नयी दिशा दी। इसी दौरान इजराइल भारत की राजधानी दिल्ली में अपना दूतावास खोला। उन्होंने ‘लुक ईस्ट’ नीति प्रारंभ की जिसके फलस्वरूप आसियान देशों से भारत की निकटता बढ़ी।

सन 1993 के बॉम्बे बम धमाकों के बाद राव के संकट प्रबंधन की बहुत तारीफ़ हुई।

बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना

नरसिंह राव के कार्यकाल की एक और महत्वपूर्ण घटना थी बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना। उत्तर प्रदेश के अयोध्या शहर स्थित बाबरी मस्जिद (जिसे प्रथम मुग़ल शाशक बाबर ने बनवाया था) को हजारों लोगों की एक भीड़ ने 6 दिसम्बर 1992 को ढहा दिया। हिन्दू मान्यता के अनुसार इस जगह भगवान् राम का जन्म हुआ था। इस घटना के बाद देश में कई स्थानों पर दंगे हुए जिसमें हजारों लोग मारे गए।

भ्रष्टाचार के आरोप

राव पर अपनी अल्पमत सरकार को सासदों को रिश्वत देकर बचाने का आरोप लगा और निचली अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए सन 2001 में तीन साल की सजा सुनाई पर हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया।

एक और मामले में राव पर ये आरोप लगाया गया कि उन्होंने के.के. तिवारी, चंद्रास्वामी और के.एन. अग्रवाल के साथ मिलकर पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह के पुत्र अजय सिंह को नकली बैंक दस्तावेज के माध्यम से काले धन मामले में फंसाने की कोशिश की। बाद में न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया।

एक अनिवासी भारतीय लक्खुभाई पाठक के साथ धोखाधड़ी मामले में भी राव का नाम आया। सन 2003 में न्यायालय ने उन्हें इस मामले में भी बरी कर दिया।

निधन

9 दिसम्बर 2004 को राव को दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (नयी दिल्ली) में भर्ती कराया गया। 23 दिसम्बर को उन्होंने अंतिम सांसे लीं।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1921: नरसिंह राव का जन्म हुआ

1940s: काकतिया पत्रिका का संपादन प्रारम्भ किया

1951: अखिल भारतीय कांग्रेस समिति कका सदस्य बने

1957: प्रदेश विधान सभा का सदस्य चुने गए

1962-64: आंध्र प्रदेश सरकार में कानून और सूचना मंत्री रहे

1967: आंध्र प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य और दवा मंत्री रहे

1968-71: आंध्र प्रदेश सरकार में शिक्षा मंत्री रहे

1971: आंध्र प्रदेश क मुख्यमंत्री बने

1980-84: केंद्र सरकार में विदेश मंत्री रहे

1984: केन्द्रीय गढ़ मंत्री बने

1984-85: केन्द्रीय रक्षा मंत्री का कार्यभार संभाला

1985: केन्द्र सरकार में मानव संसाधन और विकास मंत्री रहे

1991: भारत के नवें प्रधानमंत्री बने

1992: उनके प्रधानमंत्रित्व में इजराइल का दूतावास नई दिल्ली में खुला

1994: नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एन.एस.इ.) का प्रारंभ

1996: 16 मई को प्रधानमंत्री का कार्यकाल की समाप्ति

1996: अपनी सरकार बचने के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और जनता दल के सांसदों को रिश्वत देने का आरोप लगा

1996: कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष चुने गए

2000: रिश्वत देने के मामले में न्यायालय में दोषी पाए गए

2002: रिश्वत देने के मामले में न्यायालय द्वारा बरी

2003: प्रवासी भर्ती व्यवसायी लाखुभई पाठक से धन लेने के मामले में बरी

2004: 9 दिसम्बर 2004 को दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया; 23 दिसम्बर को निधन

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