तैयब मेहता

Tyeb Mehta Biography in Hindi
तैयब मेहता
स्रोत: luxpresso.com

जन्म: 26 जुलाई 1925, कपद्वंज, खेड़ा, गुजरात

मृत्यु: 2 जुलाई 2009, मुंबई

कार्यक्षेत्र: चित्रकारी

तैयब मेहता एक जाने-माने भारतीय चित्रकार थे। वे प्रसिद्ध ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ के सदस्य थे। इस समूह में एफ.एन. सौज़ा, एस.एच. रजा और एम.एफ. हुसैन जैसे महान कलाकार भी शामिल थे। वे स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी के उन चित्रकारों में से थे जो राष्ट्रवादी बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट के परंपरा से हटकर एक आधुनिक विधा में कार्य करना चाहते थे।

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उनके जीवन के अंतिम दशक में उनकी बनायीं हुई पेंटिंग्स रिकॉर्ड कीमतों पर बिकीं जिसमें उनके मृत्यु के बाद बिकी एक पेंटिंग भी शामिल है जो दिसम्बर 2014 में 17 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत पर बेची गयी। इससे पहले भी मेहता की एक पेंटिंग ‘गर्ल इन लव’ लगभग 4.5 करोड़ रुपये में बिकी थी। सन 2002 में उनकी एक पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन’ लगभग 1.5 करोड़ रुपये में बिकी थी जो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उस समय तक की सबसे महंगी भारतीय पेंटिंग थी।

आज भारतीय कला में सारी दुनिया की दिलचस्पी है और इस दिलचस्पी का एक बड़ा श्रेय तैयब मेहता को भी जाता है। जब क्रिस्टी जैसी कलादीर्घा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कृतियों की नीलामी की तो भारतीय कला के लिए ये एक बड़ी बात थी। समकालीन भारतीय कला इतिहास में तैयब मेहता ही अकेले पेंटर थे जिनका काम इतने कीमतों में बिका।

प्रारंभिक जीवन      

तैयब मेहता का जन्म 26 जुलाई 1925 को गुजरात के खेड़ा जिले में हुआ था। उनका पालन-पोषण मुंबई के क्रावफोर्ड मार्केट में दावूदी बोहरा समुदाय में हुआ था। सन 1947 में उन्होंने विभाजन के बाद हुए दंगों में मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर एक व्यक्ति को पत्थर से मारे जाने की ह्रदय विदारक घटना देखी थी। इस घटना ने उनको इतना प्रभावित किया कि उनके कामों में इसकी झलक कहीं न कहीं हमें दिख ही जाती है।

तैयब मेहता ने प्रारंभ में कुछ समय के लिए मुंबई स्थित एक नामी फिल्म स्टूडियो ‘फेमस स्टूडियोज’ के लैब में फिल्म एडिटर का कार्य किया। बाद में उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में दाखिला लिया और सन 1952 में यहाँ से डिप्लोमा ग्रहण किया। इसके बाद वे ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ के सदस्य बन गए। यह ग्रुप पश्चिम के आधुनिकतावादी शैली से प्रभावित था और तैयब के साथ-साथ उसमें एफ.एन. सौज़ा, एस.एच. रजा और एम.एफ. हुसैन जैसे महान कलाकार भी शामिल थे।

करियर

सन 1959 में तैयब लन्दन चले गए और 1964 तक वहीँ रहकर कार्य किया। सन 1968 में जब उन्हें जॉन डी रॉकफेलर फ़ेलोशिप मिल गयी तब वे न्यू यॉर्क चले गए। लन्दन प्रवास के दौरान उनकी कला फ़्रन्कोइस बेकन जैसे कलाकारों से प्रभावित हुई जबकि न्यू यॉर्क प्रवास के दौरान उनकी चित्रकारी में अतिसूक्ष्म्वाद देखने को मिला।

उन्होंने बॉम्बे के बांद्रा स्थित बूचड़खाने में ‘कूदाल’ नाम की एक शार्ट फिल्म भी बनाई जिसे सन 1970 में फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड मिला।

सन 1984-85 के दौरान वे शान्तिनिकेतन में भी रहे जिसके बाद उनकी चित्रकारी में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला। इस दौरान उनके चित्रों की विषय-वस्तु ‘बंधे हुए सांड’ और ‘रिक्शापुलर्स’ थे। इसके बाद उन्होंने 1970 के दशक में ‘डायगनल’ श्रृंखला के चित्र बनाये। उन्होंने अंग विच्छेद वाली और गिरती आकृतियों का प्रयोग 70 के दशक में शुरू किया जो कला की दुनिया को उनका महत्वपूर्ण योगदान है।

सन 2002 में क्रिस्टी की नीलामी में जब उनकी एक पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन’ लगभग 1.5 करोड़ रुपये में बिकी तब उस समय किसी भी भारतीय चित्रकार की यह सबसे महंगी पेंटिंग थी। सन 2005 में भारतीय कलादीर्घा ‘सैफ्रनआर्ट’ ने ऑनलाइन नीलामी में उनकी एक पेंटिंग ‘काली’ को 1 करोड़ रुपये में बेचा। जून 2008 में क्रिस्टी ने एक नीलामी में उनकी एक पेंटिंग को 20 लाख अमेरिकी डॉलर में बेचा। सन 2005 में उनकी एक पेंटिंग ‘जेस्चर’ 3.1 करोड़ रुपये में एक भारतीय रंजित मलकानी ने खरीदी। उस समय यह किसी भी भारतीय द्वारा किसी भी भारतीय समकालीन कला के नमूने को खरीदने के लिए सबसे ज्यादा रकम थी।

तैयब मेहता पहले ऐसे भारतीय समकालीन चित्रकार थे जिनकी पेंटिंग्स 10 लाख डॉलर या उससे अधिक कीमत में बेची गयीं। यह ऐसा समय था जिसके बाद पूरी दुनिया के कला प्रशंसक भारतीय कला और चित्रकारी में गहरी दिलचस्पी लेने लगे।

तैयब मेहता के करीबी कहते हैं कि वे अपनी कला के प्रति इतने समर्पित थे कि पूर्ण रूप से संतुष्ट न होने तक अपनी पेंटिंग्स को कला दीर्घाओं में भेजने से कतराते थे। उनके अन्दर सृजनात्मकता की एक जिद थी जिसकी ख़ातिर उन्होंने कई कैनवस नष्ट कर दिए। वे मानते थे कि किसी भी कला को सार्वजनिक होने से पहले कलाकार को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए की उसमें कोई खोट नहीं रह गया हो।

व्यक्तिगत जीवन

तैयब मेहता का विवाह सकीना से हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का ज्यादातर समय मुंबई में बिताया। मुंबई के अलावा वे लन्दन, न्यू यॉर्क और शान्तिनिकेतन में भी रहे।

उनका निधन 2 जुलाई 2009 को ह्रदय गति रुक जाने के कारण मुंबई के एक अस्पताल में हुआ। वे अपने पीछे अपनी पत्नी, एक पुत्र (युसूफ) और पुत्री (हिमानी) छोड़ गए।

पुरस्कार और सम्मान

  • सन 1968 में उन्हें ‘जॉन डी रॉकफेलर फ़ेलोशिप’ प्रदान की गयी
  • सन 1968 में ही दिल्ली में पेंटिंग के लिए एक स्वर्ण पदक प्रदान किया गया
  • सन 1974 में फ्रांस में आयोजित ‘इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ़ पेंटिंग’ में उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया गया
  • सन 1988 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें ‘कालिदास सम्मान’ से नवाजा
  • सन 2005 में उन्हें कला, संस्कृति और शिक्षा के लिए दयावती मोदी फाउंडेशन पुरस्कार दिया गया
  • सन 2007 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया
  • उनकी शार्ट फिल्म ‘कूदाल’ को सन 1970 में फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड दिया गया

 

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