के. एम. करिअप्पा

Field Marshal K.M Cariappa Biography in Hindi
के. एम. करिअप्पा
स्रोत: www.itstamil.com

जन्म: 28 जनवरी, 1899, कुर्ग, कर्नाटक

मृत्यु: 15 मई, 1993, बंगलौर

कार्यक्षेत्र: प्रथम भारतीय सेनाध्यक्ष, फ़ील्ड मार्शल

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा भारतीय सेना के प्रथम कमांडर-इन-चीफ थे। के.एम. करिअप्पा ने सन् 1947 के भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। वे भारतीय सेना के उन दो अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गयी। फील्ड मार्शल सैम मानेकशा दूसरे ऐसे अधिकारी थे जिन्हें फील्ड मार्शल का रैंक दिया गया था। उनका मिलिटरी करियर लगभग 3 दशक लम्बा था जिसके दौरान 15 जनवरी 1949 में उन्हें सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। इसके बाद से ही 15 जनवरी ‘सेना दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। करिअप्पा का सम्बन्ध राजपूत रेजीमेन्ट से था। वे सन 1953 में सेवानिवृत्त हो गये फिर भी किसी न किसी रूप में भारतीय सेना को सहयोग देते रहे।

Story of Bhagat Singh

प्रारंभिक जीवन

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी, 1899 में कर्नाटक के कोडागु (कुर्ग) में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर हुआ था। कुर्ग उस समय एक रियासत थी। उनके पिता कोडंडेरा माडिकेरी में एक राजस्व अधिकारी थे। वे अपने परिवार सहित लाइम कॉटेज में रहा करते थे। के.एम. करिअप्पा के अलावा उनके तीन भाई तथा दो बहनें भी थीं। उन्हें परिवार के सभी सदस्य और रिश्तेदार स्नेह से ‘चिम्मा’ कहकर पुकारते थे।

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा माडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल में हुई। वे शुरुआत से ही पढ़ाई में मेधावी थे और गणित एवम चित्रकला विषय उनको सबसे प्रिय थे। जब भी उन्हें खाली वक़्त मिलता वे कैरीकेचर बनाने में गुजारते थे। उनकी स्कूली शिक्षा सन 1917 में पूरी हुई जिसके पश्चात् आगे की पढ़ाई के लिए उसी साल उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कालेज में दाखिला ले लिय़ा। कालेज जीवन में उन्हें कई विद्वान् अध्यापक मिले जिनका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्ही के मार्गदर्शन में करिअप्पा का किताबों के प्रति लगाव भी बढ़ा। पढ़ाई के साथ-साथ के.एम.करिअप्पा क्रिकेट, हॉकी और  टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी थे। पढ़ाई और खेल-कूद के साथ उन्हें संगीत का भी बहुत शौक था।

कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद ही उनका चयन सेना में अधिकारी के तौर पर हो गया।

मिलिटरी करियर

प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीय राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश सरकार से भारतीयों को भी सेना में कमीशन देने की मांग की जिसे मान लिया गया। सख्त जांच और परीक्षण के बाद के.एम.करिअप्पा को उस प्रथम दल में शामिल कर लिया गया जिसे कठोर प्री-कमीशन प्रशिक्षण दिया जाना था। सन 1919 में वे KCIOs  (King’s Commissioned Indian Officers) के पहले दल में सम्मिलित किये गए जिन्हें इंदौर के डैली कॉलेज  में प्रशिक्षण दिया गया। उसके पश्चात उन्हें कार्नाटिक इन्फेंट्री में बतौर टेम्पररी सेकेण्ड लेफ्टिनेंट कमीशन दिया गया। सन 1921 में उन्हें टेम्पररी लेफ्टिनेंट बना दिया गया और सन 1922 में उन्हें स्थायी कमीशन दिया गया और वे ‘सेकेण्ड लेफ्टिनेंट’ बनाये गए। तत्पश्चात करिअप्पा को सन 1923 में लेफ्टिनेंट के पद पर पदोन्नत किया गया।

सन 1927 में करिअप्पा को कैप्टेन के पद पर पदोन्नत कर दिया गया पर इस पदोन्नति को सन 1931 तक सरकारी तौर पर राजपत्रित नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने डोगरा रेजिमेंट के साथ मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) में अपनी सेवाएं दी। सन 1933 में क्वेट्टा के ‘स्टाफ कॉलेज’ में प्रशिक्षण कोर्स करने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी बने। सन 1938 में उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया। उसके अगले साल ही उन्हें स्टाफ कैप्टेन बना दिया गया।

सन 1941-42 में उन्हें इराक,सीरिया और ईरान में तैनात किया गया और सन 1943-44 में उन्होंने अपनी सेवाएं बर्मा में दी। सन 1942 में किसी यूनिट का कमांड पाने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी बने। सन 1944 में उन्हें टेम्पररी लेफ्टिनेंट कर्नल बना दिया गया। इसके पश्चात उन्होंने स्वेच्छा से 26वें डिविजन को अपनी सेवाएं दी जो बर्मा से जापानियों को निकालने में कार्यरत थी। यहाँ उन्हें ‘ऑफिसर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर’ बनाया गया। जुलाई 1946 में उन्हें पूर्ण लेफ्टिनेंट कर्नल का पद दिया गया और उसी साल उन्हें फ्रंटियर ब्रिगेड ग्रुप का ब्रिगेडिएर बना दिया गया। सन 1947 में उन्हें ‘इम्पीरियल डिफेन्स कॉलेज’ यूनाइटेड किंगडम, में एक प्रशिक्षण कोर्स के लिए चुना गया। इस कोर्स के लिए चुने जाने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी थे।

भारत के विभाजन के समय उन्हें सेना के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गयी जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा, न्यायोचित और सौहार्दपूर्ण तरीके से पूरा किया।

देश की आजादी के बाद करिअप्पा को मेजर जनरल रैंक के साथ ‘डिप्टी चीफ ऑफ़ द जनरल स्टाफ’ नियुक्त किया गया। जब उनकी पदोन्नति  लेफ्टिनेंट जनरल के तौर पर हुई तब उन्हें ईस्टर्न आर्मी का कमांडर बना दिया गया। सन 1947 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय उन्हें पश्चिमी कमान का जी-ओ-सी-इन-सी बनाया गया। उनके नेतृत्व में ज़ोजिल्ला, द्रास और कारगिल पर पुनः कब्ज़ा किया गया। कठिन परिस्थितियों में भी के.एम.करिअप्पा ने जिस स्फूर्ति के साथ अपनी सेना का जिस प्रकार से नेतृत्व किया उसके बाद लगभग उनका अगला कमांडर इन चीफ बनना तय हो गया। 15 जनवरी 1949 को के. एम. करिअप्पा को भारतीय सेना का प्रमुख चुना गया। इस प्रकार सेना का कमांडर इन चीफ बनने वाले वे पहले भारतीय हो गए।

सन 1953 में वे भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हो गए और उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यू ज़ीलैण्ड में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया जहाँ उन्होंने 1956 तक अपनी सेवाएं दी।

एक वरिष्ठ अनुभवी अधिकारी के नाते उन्होंने कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी सहायता की। उन्होंने चीन, जापान, अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और कई और यूरोपिय देशों की यात्रा की।

अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उन्हें ‘आर्डर ऑफ़ द चीफ कमांडर ऑफ़ द लीजन ऑफ़ मेरिट’ से सम्मानित किया।

देश को दी गयी उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने सन 1986 में उन्हें ‘फील्ड मार्शल’ का पद प्रदान किया।

सेवानिवृत्ति के बाद के.एम.करिअप्पा कर्नाटक के कोडागु जिले के मदिकेरी में बस गए। वे प्रकृति प्रेमी थे और लोगों को पर्यावरण संरक्षण आदि के बारे में भी अवगत कराया।

मृत्यु

फील्ड मार्शल के.एम करिअप्पा का निधन 15 मई 1993 को कर्णाटक की राजधानी बैंगलोर में हो गया। मृत्यु के समय उनकी आयु 94 साल थी।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1899: के.एम करिअप्पा का जन कर्नाटक के कुर्ग में हुआ

1919: ब्रिटिश इंडियन आर्मी में टेम्पररी सेकंड लेफ्टिनेंट चुने गए

1921: टेम्पररी लेफ्टिनेंट बनाये गए

1922: पूर्णकालिक सेकंड लेफ्टिनेंट बनाये गए

1923: लेफ्टिनेंट के पद पर पदोन्नति

1927: ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कैप्टेन बने

1938: मेजर पद पर पदोन्नति

1942: टेम्पररी सेकेण्ड लेफ्टिनेंट बने

1944: टेम्पररी ब्रिगेडिएर बनाये गए

1946: पहले लेफ्टिनेंट कर्नल और फिर ब्रिगेडिएर बने

1947: मेजर जनरल बने

1948: लेफ्टिनेंट जनरल बनाये गए

1949: भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ बनाये गए

1953: सेना से सेवानिवृत्त हुए

1953: ऑस्ट्रेलिया और न्यू ज़ीलैण्ड में भारत के उच्चायुक्त नियुक्त किये गए

1983: भारत सरकार ने उन्हें ‘फील्ड मार्शल’ के पद से सम्मानित किया

1993: 94 साल की उम्र में निधन हो गया

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